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जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख हाई कोर्ट ने वर्ष 2017 में श्रीनगर की जामिया मस्जिद के पास डीएसपी रैंक के एक पुलिस अधिकारी की हत्या के मामले में आरोपित बिलाल अहमद लोन की पब्लिक सेफ्टी एक्ट (पीएसए) के तहत निवारक हिरासत को बरकरार रखा है।

श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख हाई कोर्ट ने वर्ष 2017 में श्रीनगर की जामिया मस्जिद के पास डीएसपी रैंक के एक पुलिस अधिकारी की हत्या के मामले में आरोपित बिलाल अहमद लोन की पब्लिक सेफ्टी एक्ट (पीएसए) के तहत निवारक हिरासत को बरकरार रखा है। कोर्ट ने श्रीनगर के जिला मजिस्ट्रेट की ओर से 11 अक्टूबर 2024 को जारी हिरासत आदेश को चुनौती देने वाली लोन की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका खारिज कर दी।

न्यायमूर्ति संजय धर ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि निवारक हिरासत के आदेश में हस्तक्षेप करने के लिए कोई पर्याप्त कानूनी आधार नहीं है। कोर्ट ने हिरासत के आधार को स्पष्ट और विशिष्ट माना तथा कहा कि हिरासत प्राधिकरण ने जिन दस्तावेजों और सामग्री पर भरोसा किया, उन्हें बंदी को उपलब्ध कराया गया था।

जामिया मस्जिद के पास डीएसपी की हुई थी हत्या

कोर्ट के समक्ष पेश हिरासत संबंधी रिकॉर्ड के अनुसार, बिलाल अहमद लोन पर 22 और 23 जून 2017 की दरमियानी रात श्रीनगर की ऐतिहासिक जामिया मस्जिद के पास डीएसपी रैंक के एक पुलिस अधिकारी की हत्या में कथित रूप से शामिल होने का आरोप है।

उक्त अधिकारी को जामिया मस्जिद में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के जमावड़े के शांतिपूर्ण समापन के लिए सुरक्षा व्यवस्था के सिलसिले में तैनात किया गया था। इसी दौरान उन पर हमला किया गया था।

पाकिस्तान स्थित हैंडलर से संपर्क का भी आरोप

अधिकारियों ने नया हिरासत आदेश जारी करते समय लोन की कथित पिछली गतिविधियों के साथ-साथ बाद में मिली सूचनाओं को भी आधार बनाया। हिरासत रिकॉर्ड के मुताबिक, सितंबर 2024 में पिछली हिरासत से रिहा होने के बाद ऐसी विश्वसनीय सूचना मिली थी कि द रेजिस्टेंस फ्रंट (टीआरएफ) से जुड़े पाकिस्तान स्थित एक हैंडलर ने कथित तौर पर एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग एप के माध्यम से लोन से संपर्क किया था।

हिरासत के आधार में कहा गया कि उक्त हैंडलर ने कथित तौर पर लोन को आतंकी गतिविधियों के लिए युवाओं की भर्ती करने का निर्देश दिया था।

लगातार हिरासत में रहने की दलील खारिज

लोन की ओर से हाई कोर्ट में प्रमुख दलील दी गई कि वह लगातार हिरासत में था। इसलिए उसके खिलाफ नया निवारक हिरासत आदेश कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं है।

कोर्ट ने हिरासत संबंधी रिकॉर्ड की जांच के बाद इस दलील को खारिज कर दिया। न्यायमूर्ति संजय धर ने कहा कि लोन को पिछली हिरासत से 10 सितंबर 2024 को रिहा किया गया था, जबकि नया पीएसए हिरासत आदेश इसके बाद 11 अक्टूबर 2024 को जारी किया गया।

इस आधार पर कोर्ट ने कहा कि पिछली हिरासत और नई निवारक हिरासत के बीच रिहाई की अवधि थी। इसलिए लगातार हिरासत में रहने संबंधी दलील में कोई दम नहीं है।

बंदी को उपलब्ध कराई गई 58 पन्नों की सामग्री

हाई कोर्ट ने हिरासत आदेश के लिए इस्तेमाल की गई सामग्री उपलब्ध नहीं कराने संबंधी दलील की भी जांच की। रिकॉर्ड से पता चला कि लोन को हिरासत आदेश, हिरासत के आधार, डोजियर और अन्य संबंधित दस्तावेज उपलब्ध कराए गए थे। इन दस्तावेजों की कुल लंबाई 58 पन्ने थी।

कोर्ट ने यह भी पाया कि लोन की ओर से हिरासत के खिलाफ सरकार को दिया गया प्रतिवेदन विचार के बाद खारिज कर दिया गया था।

हिरासत के आधार को कोर्ट ने माना स्पष्ट

न्यायमूर्ति संजय धर ने कहा कि हिरासत के आधार अस्पष्ट या सामान्य प्रकृति के नहीं थे। इनमें हिरासत प्राधिकरण की संतुष्टि का आधार बनने वाले विशिष्ट आरोप और संबंधित सामग्री मौजूद थी।

रिकॉर्ड और दोनों पक्षों की दलीलों की समीक्षा के बाद कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि निवारक हिरासत की कार्यवाही में आवश्यक प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों का पालन किया गया है। साथ ही, अधिकारियों ने जिस सामग्री पर भरोसा किया था, वह भी बंदी को उपलब्ध कराई गई थी।

हाई कोर्ट ने कहा कि हिरासत आदेश में हस्तक्षेप करने का कोई कानूनी आधार नहीं बनता। इसके बाद कोर्ट ने बिलाल अहमद लोन की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका खारिज कर दी।

फैसले के परिणामस्वरूप श्रीनगर के जिला मजिस्ट्रेट की ओर से 11 अक्टूबर 2024 को जारी पीएसए के तहत निवारक हिरासत का आदेश प्रभावी रहेगा और यह कानून के लागू प्रावधानों के अधीन रहेगा।

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