
श्रीनगर। श्रीनगर में दशहरे के लिए रावण, मेघनाद और कुंभकरण के पुतलों को अंतिम रूप दिया जा रहा है। कारीगर त्योहार की तैयारियों में जुटे हैं और कश्मीरी पंडित संघर्ष समिति (केपीएसएस) अपनी सालाना परंपरा को आगे बढ़ाने की तैयारी कर रही है। घाटी में दशहरे का यह आयोजन केवल धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि उस परंपरा की निरंतरता भी है, जिसे आतंकवाद और बड़े पैमाने पर हुए पलायन के दौर में लंबा व्यवधान झेलना पड़ा था। मंगलवार 20 अक्टूबर को शहर के शेर-ए-कश्मीर स्टेडियम में रावण दहन किया जाएगा।
श्रीनगर में दशहरे की मौजूदा परंपरा का इतिहास करीब चार दशक पीछे जाता है। वर्ष 1987 में शहर के इकबाल पार्क, जिसे पहले हजूरी बाग के नाम से भी जाना जाता था, में दशहरा मनाया गया था। इसके बाद घाटी में आतंकवाद बढ़ने और कश्मीरी हिंदुओं के बड़े पैमाने पर पलायन के बीच यह आयोजन बंद हो गया।
अक्टूबर 2007 में कश्मीरी पंडित संघर्ष समिति ने करीब 20 साल के अंतराल के बाद श्रीनगर में दशहरा मनाया। उस वर्ष रावण का पुतला शेर-ए-कश्मीर स्टेडियम में जलाया गया। आयोजन में घाटी में रह रहे कश्मीरी पंडितों के साथ जम्मू से आए कुछ परिवार भी शामिल हुए थे। उस दौर में दशहरा आयोजित करना केवल धार्मिक कार्यक्रम तक सीमित नहीं था।
आतंकवाद और पलायन के बीच कमजोर पड़ी परंपराओं को फिर मिला सहारा
घाटी में आतंकवाद के उभार और 1990 के आसपास बड़े पैमाने पर कश्मीरी पंडितों के पलायन के बाद समुदाय की सामाजिक और सांस्कृतिक जिंदगी पर गहरा असर पड़ा था। ऐसे माहौल में स्थानीय स्तर पर दशहरे की वापसी ने उन परिवारों के लिए अपनी परंपरा से जुड़े रहने का अवसर बनाया, जिन्होंने घाटी नहीं छोड़ी थी।
2024 में 32 फीट का रावण बना था आकर्षण
श्रीनगर में दशहरे के आयोजन का सिलसिला बाद के वर्षों में भी जारी रहा। अक्टूबर 2024 में शहर के पोलो ग्राउंड में दशहरा समारोह की तैयारियां की गई थीं। उस समय रावण का 32 फीट ऊंचा पुतला आकर्षण का केंद्र था।
केपीएसएस के प्रधान संजय टिक्कू ने कहा कि लगभग 19 साल बाद, यह सिलसिला जारी रहना अपने आप में महत्वपूर्ण है। यह बताता है कि कठिन परिस्थितियों के बावजूद सांस्कृतिक परंपराओं को बनाए रखने की कोशिश लगातार चलती रही है।
टिक्कू ने बताया कि मंगलवार को श्रीनगर के शेर-ए-कश्मीर स्टेडियम में होने वाले रावण दहन में हर बार की तरह इस बार भी घाटी के विभिन्न समुदायों के साथ पर्यटक भी शामिल होंगे। उन्होंने कहा कि धार्मिक आयोजन का महत्व उसके अनुष्ठानों तक सीमित नहीं रहता। उसमें लोगों की भागीदारी, आपसी परिचय और स्थानीय समाज के साथ संबंध बनाने की संभावनाएं भी जुड़ी होती हैं।
2025 में शोभायात्रा की वापसी भी रही चर्चा में
वहीं श्रीनगर में रह रहे कश्मीरी हिंदू मोहित भान ने बताया कि अक्टूबर 2025 में श्रीनगर में दशहरा समारोह के दौरान शोभायात्रा और रावण दहन ने सभी का ध्यान खींचा। शेर-ए-कश्मीर स्टेडियम में आयोजित कार्यक्रम में कश्मीरी हिंदुओं सहित विभिन्न समुदायों के लोगों की अधिक संख्या में भागीदारी देखने को मिली थी। इस बार भी स्टेडियम में लोगों की भीड़ जुटने की संभावना है। दोपहर तक पुतले स्टेडियम में खड़े कर दिए जाएंगे।
उन्होंने कहा कि श्रीनगर में दशहरे की तैयारियां कश्मीर की एक ऐसी तस्वीर सामने लाती हैं, जिसमें धार्मिक परंपराओं को जारी रखने की कोशिश महत्वपूर्ण है। कश्मीर में धार्मिक परंपराओं की चर्चा कश्मीरी हिंदू समुदाय के इतिहास के बिना अधूरी है।
उन्होंने कहा कि दशहरे के दिन होने वाला रावण दहन बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है, लेकिन श्रीनगर में इस आयोजन की अपनी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि भी है कि 1987 में रुकी परंपरा का 2007 में फिर शुरू होना और उसके बाद इसे लगातार आगे बढ़ाने की कोशिश।
