36 साल बाद कश्मीर की भैरव गुफा में गूंजी घंटियां

श्रीनगर। आतंकवाद के चलते 1990 के दशक में घाटी से सामूहिक पलायन कर चुके कश्मीरी हिंदुओ जो प्रागाश ग्लोबल कश्मीरी हिंदू हेरिटेज टूर के तहत घाटी के हालिया दौरे पर थे, ने लगभग 36 साल बाद कश्मीर के बडगाम ज़िले के बीरवाह इलाके में सिथत भैरव केव के नाम से एक एतिहासिक पवित्र गुफा के दर्शन किए।

इस अवसर पर इस दल का मुस्लिम समुदाय के लोगों ने गर्मजोशी से स्वागत किया। बता देते हैं कि इस दल में अमेरिका, कई यूरोपीय देशों और देश के अलग-अलग हिस्सों से आए कश्मीरी हिंदू शामिल थे। कई लोगों के लिए यह यात्रा अपनी जड़ों, बचपन की यादों और अपनी पहचान से जुड़ी जगहों से भावनात्मक रूप से फिर से जुड़ने का मौका साबित हुई। आए हुए समूह का स्वागत स्थानीय निवासियों, समुदाय के नेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने किया।

उन्होंने मेहमाननवाज़ी की और इलाके के मुख्य कस्बे में पहाड़ी पर सिथत ऐतिहासिक भैरव गुफा की यात्रा के दौरान उनके साथ रहे। इस मौके पर बातचीत के दौरान, लोगों ने कश्मीर की मिली-जुली संस्कृति पर चर्चा की और पुराने समय को याद किया जब अलग-अलग समुदाय साथ रहते थे, त्योहार मिलकर मनाते थे और खुशी और गम के मौकों पर एक-दूसरे का साथ देते थे। स्थानीय मुस्लिम समुदाय के सदस्यों ने विस्थापित हिंदुओं को घाटी के सामाजिक और सांस्कृतिक ताने-बाने का एक अटूट हिस्सा बताया और कहा कि उनकी मौजूदगी के बिना घाटी की पहचान अधूरी है।

आए हुए दल ने मिले स्वागत और मेहमाननवाज़ी के लिए आभार जताया। कई सदस्यों ने इस यात्रा को भावनात्मक रूप से घर वापसी जैसा बताया, अपनी पुश्तैनी ज़मीन की यादें ताज़ा कीं और दशकों बाद स्थानीय निवासियों से फिर से जुड़कर खुशी ज़ाहिर की। दल में शामिल ओपेंद्र कौल नामक एक विस्थापित कश्मीरी हिंदू ने कहा,यकीन ही नही आता कि आज हम अपने तीर्थ स्थलों पर अपने मुसिलम भाइयों के साथ आए हैं,बिलकुल उसी तरह जिस तरह हम यहां आतंकवाद फूटने से अपने मुसलिम भाइयों के साथ आते थे।

कौल ने कहा, हम ईद भी मिलजुल कर मनाते थे और हेरथ भी। दीवाली के दीप भी हम साथ ही जलाते थे और ईदों पर रोफ(लोक गीत जो शादियों व तीज त्योहारों पर गाए जाते हैं) लेकिन फिर आतंक की आंधी ने सब कुछ तहस नहस कर दिया था। कौल के पास ही खड़ी ऊशा राजदान नामक एक विस्थापक महिला ने कहा,आज जिस तरह हमारे मुसलमान भाइयों ने यहां हमारा स्वागत किया,उसे हमारी आशाएं फिर से जाग उठी हैं। हमें हौसला मिला है,स्थायी तौर पर यहां शिफ्ट होने और अपने इन मुसलिम बहन भाइयों के साथ मिलजुल कर रहने का। राजदान ने कहा,हमारी यही प्रार्थणा है कि वह दिन जलद आए।

बता देते हैं कि यह यात्रा ऐसे समय में हुई है जब जम्मू-कश्मीर में विस्थापित कश्मीरी हिंदुओ की वापसी, पुनर्वास और उन्हें फिर से समाज में शामिल करने पर व्यापक सामाजिक और राजनीतिक चर्चा हो रही है। दोनों पक्षों के लोगों ने लोगों के बीच आपसी संपर्क को मज़बूत करने और आपसी सम्मान, सहनशीलता और सांप्रदायिक सद्भाव के मूल्यों को बनाए रखने पर ज़ोर दिया, जिन्होंने ऐतिहासिक रूप से कश्मीरी समाज की पहचान बनाई है।

यह सभा शांति, मेल-मिलाप और मज़बूत सामुदायिक संबंधों को बढ़ावा देने के सामूहिक संकल्प के साथ समाप्त हुई। इससे यह संदेश मिला कि कश्मीर का भविष्य भरोसा फिर से बनाने और इसके अलग-अलग समुदायों को फिर से जोड़ने में ही है।

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