आतंकवाद की आर्थिक जड़ों पर प्रहार, बिना अनुमति चंदा जुटाना प्रतिबंधित

श्रीनगर। आतंकवाद की आर्थिक जड़ों पर प्रहार करते हुए जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने राहत, सामाजिक सेवा और मानवीय सहायता के नाम पर बिना अनुमति चंदा जुटाने पर सख्त रोक लगाने का फैसला किया है।

इसकी शुरुआत बारामुला से की गई है, जहां अब किसी भी व्यक्ति, संस्था, ट्रस्ट या गैर-सरकारी संगठन को प्रशासन की मंजूरी के बिना धन संग्रह अभियान चलाने की अनुमति नहीं होगी। सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि हवाला, संदिग्ध फंडिंग और कथित चैरिटी नेटवर्क के जरिए आतंकी संगठनों तक धन पहुंचाने के प्रयासों को रोकने की दिशा में यह महत्वपूर्ण कदम है।

घाटी में सक्रिय संदिग्ध वित्तीय नेटवर्क और हवाला चैनलों पर पहले से नजर रख रही सुरक्षा एजेंसियों को आशंका है कि राहत और सामाजिक कार्यों के नाम पर जुटाई जाने वाली धनराशि का कुछ मामलों में दुरुपयोग कर आतंकी गतिविधियों को वित्तीय मदद पहुंचाई जा सकती है। अधिकारियों के अनुसार, किसी भी आतंकी संगठन को कमजोर करने का सबसे प्रभावी तरीका उसके आर्थिक स्रोतों को बंद करना है।

बारामुला से शुरुआत, अब बिना अनुमति नहीं चलेगा धन संग्रह अभियान

बारामुला के जिला मजिस्ट्रेट ने आदेश जारी कर स्पष्ट किया है कि जिले में कोई भी व्यक्ति, संस्था, एनजीओ या ट्रस्ट सक्षम प्राधिकारी की पूर्व अनुमति के बिना चंदा नहीं जुटा सकेगा।

आदेश के अनुसार, धन संग्रह शुरू करने से पहले संबंधित संस्था को अपने अभियान का उद्देश्य, धन के स्रोत, संग्रह की प्रक्रिया और राशि के उपयोग का पूरा ब्योरा प्रशासन को देना होगा। प्रशासन का कहना है कि अनधिकृत धन संग्रह से पारदर्शिता और जवाबदेही प्रभावित होती है। इसके जरिए लोगों की भावनाओं का दुरुपयोग कर फर्जी अभियानों के माध्यम से धन जुटाने और उसके दुरुपयोग की आशंका बनी रहती है।

आपदा पीड़ितों की मदद के नाम पर चल रहा था संदिग्ध अभियान

यह कार्रवाई बारामुला के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक की रिपोर्ट के बाद की गई। रिपोर्ट में बताया गया कि कुछ गैर-स्थानीय लोग, जिनमें महिलाएं भी शामिल थीं, प्राकृतिक आपदा पीड़ितों की सहायता के नाम पर शहर में घर-घर जाकर चंदा एकत्र कर रहे थे।

जांच के दौरान वे न तो कोई सरकारी अनुमति पत्र दिखा सके और न ही ऐसा कोई दस्तावेज प्रस्तुत कर पाए जिससे धन संग्रह अभियान की वैधता साबित होती। इसके बाद प्रशासन ने मामले को गंभीर मानते हुए तत्काल प्रतिबंधात्मक आदेश जारी कर दिए।

पहले भी चैरिटी की आड़ में आतंकियों तक पहुंचा था पैसा

प्रशासन का यह फैसला केवल एहतियाती कदम नहीं, बल्कि पिछले अनुभवों पर भी आधारित है।करीब चार वर्ष पहले बारामुला, कुपवाड़ा, बांदीपोरा और सोपोर में सक्रिय गैर-पंजीकृत इसलाही फलाही रिलीफ ट्रस्ट का भंडाफोड़ हुआ था।

जांच में सामने आया था कि यह संगठन स्थानीय लोगों से चंदा जुटाकर लश्कर-ए-तैयबा, हिज्बुल मुजाहिदीन और तहरीक-उल-मुजाहिदीन जैसे आतंकी संगठनों से जुड़े आतंकियों की आर्थिक मदद करता था। पुलिस के अनुसार, ट्रस्ट के छह सदस्य आतंकियों की भर्ती में भी सक्रिय भूमिका निभा रहे थे।

आतंकी फंडिंग पर पहले से कसा है शिकंजा

जम्मू-कश्मीर में आतंकी वित्त पोषण के खिलाफ राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए), प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) और अन्य सुरक्षा एजेंसियां लंबे समय से कार्रवाई कर रही हैं। सीमा पार से होने वाले धन शोधन, हवाला नेटवर्क और आतंकी फंडिंग से जुड़े अनेक मामलों की जांच में पाकिस्तान स्थित हिज्बुल मुजाहिदीन तथा उससे जुड़े कथित वित्तीय नेटवर्क एजेंसियों के रडार पर रहे हैं। जांच एजेंसियों का कहना है कि विभिन्न माध्यमों से जम्मू-कश्मीर में आतंकी गतिविधियों के लिए धन पहुंचाने की लगातार कोशिशें होती रही हैं।

हवाला से लेकर चैरिटी तक, हर वित्तीय रास्ता जांच के दायरे में

सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार, आतंकी संगठनों ने वर्षों तक हवाला नेटवर्क, नकद लेन-देन, सीमा-पार व्यापार और कथित चैरिटी संस्थाओं के जरिए धन जुटाने की रणनीति अपनाई।एनआईए वर्ष 2011 से हिज्बुल मुजाहिदीन की वित्तीय गतिविधियों की जांच कर रही है।

इस दौरान सीमा-पार व्यापार, हवाला चैनलों और बैंकिंग नेटवर्क के माध्यम से हुए संदिग्ध लेन-देन की जांच की गई। जम्मू-कश्मीर अफेक्टेड्स रिलीफ ट्रस्ट और फलाह-ए-आलम ट्रस्ट जैसे कुछ संगठनों की गतिविधियां भी जांच एजेंसियों के दायरे में आ चुकी हैं।

आर्थिक स्रोत बंद करना ही आतंक के खिलाफ सबसे कारगर हथियार

सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि आतंकवाद केवल हथियारों के दम पर नहीं, बल्कि मजबूत वित्तीय नेटवर्क के सहारे चलता है। हथियार खरीदने, प्रशिक्षण, भर्ती, प्रचार और संगठनात्मक गतिविधियों के लिए लगातार धन की जरूरत होती है। ऐसे में वित्तीय स्रोतों पर चोट करना आतंकवाद की कमर तोड़ने की सबसे प्रभावी रणनीति मानी जाती है।

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