
जम्मू। केंद्र ने यह स्पष्ट कर दिया है कि लद्दाख को छठी अनुसूची का दर्जा या राज्य का दर्जा नहीं दिया जाएगा। लेह सर्वोच्च निकाय (एलएबी) और कारगिल लोकतांत्रिक गठबंधन (केडीए) की ये दो प्रमुख मांगें थीं। क्षेत्र के दो प्रमुख राजनीतिक संगठनों ने पिछले सप्ताह नई दिल्ली में हुई बातचीत के बाद यह बात कही।
संविधान की छठी अनुसूची आदिवासी क्षेत्रों की स्वायत्तता, संस्कृति और भूमि की सुरक्षा के लिए विशेष प्रशासनिक व्यवस्थाओं का प्रावधान करती है। केंद्रीय गृह मंत्रालय की उच्च-स्तरीय समिति के साथ 4 फरवरी को हुई वार्ता के बाद पहली बार सार्वजनिक रूप से बोलते हुए लद्दाख के नेताओं ने कहा कि केंद्र ने इसके बजाय एक “क्षेत्रीय परिषद” मॉडल का प्रस्ताव रखा है।
इस प्रस्ताव के तहत, लद्दाख स्वायत्त पहाड़ी विकास परिषद के मुख्य कार्यकारी पार्षद को मुख्यमंत्री और उप मुख्य कार्यकारी पार्षद को उप मुख्यमंत्री नामित किया जाएगा।
उन्होंने कहा की हम इसे एक तमाशा कहते हैं। एलएबी और केडीए ने इसे (प्रस्ताव को) अस्वीकार कर दिया, सिवाय केडीए के एक सदस्य, कुंजेज डोल्मा के,” केडीए के सह-अध्यक्ष असगर अली करबली ने बुधवार को कारगिल में एक सभा में कहा।
चार तारीख को हुई थी वार्ता
कारगिल डेमोक्रेटिक एलायंस (केडीए) की एपेक्स बाडी और केंद्रीय गृह मंत्रालय के बीच चार फरवरी को बैठक हुई थी। बैठक की अध्यक्षता केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने की।
बैठक के बाद पत्रकारों से बातचीत में एपेक्स बॉडी के सह-अध्यक्ष और केडीए नेता असगर अली करबलाई ने बताया कि चर्चा मुख्य रूप से दो प्रमुख मांगों पर केंद्रित रही जिसमें लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा दिए जाने और लद्दाख को संविधान की छठी अनुसूची में शामिल किए जाने शामिल थे। उन्होंने कहा कि ये मांगें पहले ही गृह मंत्रालय को सौंपे गए मसौदा प्रस्ताव के आधार पर रखी गई थीं।
क्या है छठी अनुसूची?
भारतीय संविधान की छठी अनुसूची (अनुसूची 6) मुख्य रूप से असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम राज्यों के जनजातीय क्षेत्रों के प्रशासन से जुड़ी हुई है। ये सूची इन क्षेत्रों में आदिवासी समुदायों की संस्कृति और अधिकारों की रक्षा के लिए स्वायत्त जिला परिषदों (Autonomous District Councils) के गठन का प्रावधान करती है। इसके जरिए स्थानीय मुद्दों को स्वायत्तता मिली हुई है।
