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कश्मीर का ये गांव है ‘पेंसिल विलेज ऑफ इंडिया’, देश की पेंसिल इंडस्ट्री में 80% तक हिस्सेदारी; अब BIS की बड़ी पहल

श्रीनगर। देश के करोड़ों बच्चों की लिखावट से कश्मीर का एक ऐसा रिश्ता है, जिसके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं। स्कूलों में इस्तेमाल होने वाली पेंसिलों के पीछे दक्षिण कश्मीर के पुलवामा जिले के ऊखू गांव के कारीगरों और उद्यमियों की मेहनत भी शामिल है।

देश की पेंसिल सप्लाई चेन में 80 फीसदी तक हिस्सेदारी रखने वाला यह गांव ‘पेंसिल विलेज ऑफ इंडिया’ के नाम से पहचान बना चुका है। अब भारतीय मानक ब्यूरो (बीआइएस) के जम्मू-कश्मीर शाखा कार्यालय की पेंसिल स्लैट निर्माताओं के साथ हुई बैठक ने इस उद्योग के लिए गुणवत्ता, मानकीकरण और राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धा की नई संभावनाओं को उजागर कर दिया है।

यह कश्मीर के उस विनिर्माण क्षेत्र की कहानी है, जिसने स्थानीय संसाधनों के दम पर देश की पेंसिल निर्माण शृंखला में अपनी जगह बनाई है।

पुलवामा की लकड़ी से बनती हैं देश की मशहूर पेंसिल

पुलवामा का ऊखू और लस्सीपोरा क्षेत्र पेंसिल निर्माण के लिए इस्तेमाल होने वाली लकड़ी की स्लैट्स तैयार करने के लिए जाना जाता है। पॉपलर की लकड़ी से बनने वाली ये पतली पट्टियां आगे चलकर पेंसिल निर्माण में इस्तेमाल होती हैं।

कश्मीर की इकाइयां नटराज और अप्सरा जैसे ब्रांडों के निर्माता हिंदुस्तान पेंसिल्स तथा डीओएमएस जैसी कंपनियों की आपूर्ति शृंखला से जुड़ी हुई हैं। यह उद्योग इस बात का उदाहरण है कि स्थानीय संसाधनों और उद्यमशीलता को सही बाजार मिलने पर दूर-दराज के क्षेत्र भी राष्ट्रीय विनिर्माण अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं।

बीआइएस के मानकों पर जोर

भारतीय मानक ब्यूरो की ओर से पेंसिल स्लैट निर्माताओं के साथ आयोजित एमएसएमइ बैठक इस उद्योग के लिए अहम है। बैठक में गुणवत्ता मानकों, उत्पाद प्रमाणन और बीआइएस के नियमों के अनुपालन पर चर्चा की गई। इसका महत्व इसलिए भी है क्योंकि किसी उत्पाद की गुणवत्ता में निरंतरता, उत्पादन प्रक्रिया पर नियंत्रण और निर्धारित मानकों का पालन औद्योगिक कारोबार की विश्वसनीयता मजबूत करने में मदद करते हैं।

बीआइएस का पेंसिल स्लैट्स के लिए भारतीय मानक आइएस 3084 भी है। यदि स्थानीय इकाइयां संबंधित मानकों के अनुरूप अपनी उत्पादन व्यवस्था को मजबूत करती हैं और आवश्यक प्रमाणन प्राप्त करने की प्रक्रिया पूरी करती हैं, तो यह उनके कारोबार के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि बन सकती है।

रोजगार और कारोबार को नई ऊंचाई देने की संभावना

पेंसिल स्लैट उद्योग की सफलता का असर केवल कारखानों तक सीमित नहीं है। लकड़ी की आपूर्ति, प्रसंस्करण, मशीन संचालन, पैकिंग और परिवहन जैसी गतिविधियां भी इससे जुड़ी हैं। गुणवत्ता में सुधार और उत्पादन क्षमता के विस्तार से स्थानीय कारोबार को मजबूती मिलने की संभावना है।

लेकिन इस उद्योग के सामने एक बड़ी चुनौती कच्चे माल की उपलब्धता भी है। बीआइएस की बैठक में पॉपलर की कमी और बढ़ती लागत को लेकर भी चिंता जताई गई। इसलिए गुणवत्ता मानकों के साथ-साथ नए पौधरोपण, लकड़ी की नियमित आपूर्ति, आधुनिक मशीनरी और बेहतर औद्योगिक सुविधाओं पर भी ध्यान देने पर भी जोर दिया गया।

अब स्लैट्स से तैयार पेंसिल तक पहुंचने की चुनौती

कश्मीर के उद्योग के लिए अगला बड़ा अवसर केवल दूसरे राज्यों को कच्चा माल उपलब्ध कराने तक सीमित न रहकर तैयार पेंसिल निर्माण में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाना है। इसके लिए निवेश, तकनीकी सहयोग, कुशल श्रमिकों और बाजार तक बेहतर पहुंच की जरूरत होगी।

बीआइएस की पहल इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती है। यदि गुणवत्ता सुधार, कच्चे माल की उपलब्धता और सरकारी औद्योगिक सहयोग को साथ लेकर चला जाए, तो पुलवामा का ‘पेंसिल विलेज’ कश्मीर की पहचान को राष्ट्रीय बाजार में और मजबूत कर सकता है।

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