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कौन हैं खीर भवानी देवी? जिनका कुंड का पानी बताता है कश्मीर का कल, दर्शनों को देश-विदेश से पहुंचे कश्मीरी हिंदू

श्रीनगर। कश्मीर की वादियों में एक ऐसा कुंड है जो आपदा से पहले खुद ही संकेत दे देता है। जी हां, हम बात कर रहे हैं कश्मीरी हिंदुओं की सबसे बड़ी आस्था ‘खीर भवानी मेला’ की, जहां श्रद्धा के साथ रहस्य भी बहता है। गांदरबल जिले के तुलमुला गांव में स्थित माता रागन्या देवी मंदिर में हर साल की तरह इस बार भी ज्येष्ठ शुक्ल अष्टमी पर हजारों श्रद्धालु एकत्र हुए हैं और पवित्र कुंड में दूध-खीर अर्पित करते नजर आ रहे हैं।

‘खीर’ यानी चावल की खीर। भक्त देवी को प्रसन्न करने के लिए कुंड में दूध और खीर चढ़ाते हैं। इसी परंपरा से माता रागन्या देवी का नाम ‘खीर भवानी’ पड़ा। इन्हें महाराज्ञा देवी, राज्ञी, रागन्या भगवती जैसे कई नामों से भी जाना जाता है। कश्मीरी पंडितों के लिए यह घाटी का सबसे पवित्र तीर्थ है। खीर भवानी मेला सिर्फ धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि कश्मीरी पंडित समुदाय की सांस्कृतिक विरासत और आपसी भाईचारे का अनूठा संगम है। हर साल ज्येष्ठ अष्टमी पर देश-विदेश से भक्त यहां दर्शन के लिए पहुंचते हैं। श्रीनगर से 14 मील पूर्व प्राकृतिक सुंदरता के बीच बसा यह मंदिर आज भी रहस्य और श्रद्धा की मिसाल है।

रंग बदलता कुंड

यहां का असली रहस्य है कुंड का पानी। मान्यता है कि जब इसका जल काला या गहरा हो जाए, तो कश्मीर पर कोई बड़ा संकट आता है। इसका उदाहरण कई बार दिया गया है।

  • 1886: ब्रिटिश अधिकारी वाल्टर लॉरेंस ने कुंड में बैंगनी रंग देखा था।
  • 1990: कश्मीरी पंडितों के पलायन के दौरान पानी काला पड़ गया था।
  • 2014: कश्मीर में आई विनाशकारी बाढ़ से पहले भी कुंड के रंग में बदलाव देखा गया।

आस्था और विज्ञान के बीच झूलता यह कुंड आज भी वैज्ञानिकों के लिए पहेली बना हुआ है। हालांकि कुंड के बाकी रंगों का कोई विशेष अर्थ नहीं माना जाता, पर काला रंग अशुभ संकेत देता है।

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