Headlines

BJP के सहारे सत्ता बचाने पर गिरी गाज, NC ने डॉ. अखून को 6 वर्ष के लिए किया निष्कासित, कारगिल में बगावत का अंत

श्रीनगर। लद्दाख की राजनीति में महीनों से चल रहे सत्ता संघर्ष का शनिवार को निर्णायक पटाक्षेप हो गया, जब जम्मू-कश्मीर नेशनल कॉन्फ्रेंस (जेकेएनसी) ने कारगिल स्वायत्त पहाड़ी विकास परिषद (एलएएचडीसी) के मुख्य कार्यकारी पार्षद (सीईसी) डॉ. मोहम्मद जाफर अखून को पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से छह वर्षों के लिए निष्कासित कर दिया। पार्टी ने उन पर पार्टी विरोधी गतिविधियों, अनुशासनहीनता और संगठन की राजनीतिक लाइन से खुली बगावत का आरोप लगाया है।

पार्टी महासचिव हाजी अली मोहम्मद सागर के निर्देश पर जारी आदेश में स्पष्ट किया गया कि डा अखून ने लगातार ऐसे कदम उठाए, जिनसे न केवल पार्टी की साख को नुकसान पहुंचा बल्कि गठबंधन की राजनीति भी संकट में पड़ गई। माना जा रहा है कि यह कार्रवाई लंबे समय से चल रहे सत्ता-साझेदारी विवाद और भाजपा के समर्थन से सत्ता बचाने की उनकी रणनीति का सीधा राजनीतिक परिणाम है।

दरअसल, वर्ष 2023 के कारगिल हिल काउंसिल चुनाव में नेशनल कॉन्फ्रेंस और कांग्रेस ने गठबंधन कर परिषद में बहुमत हासिल किया था। दोनों दलों के बीच हुए समझौते के अनुसार पहले ढाई वर्ष तक सीईसी का पद नेशनल कॉन्फ्रेंस के पास रहना था, जबकि अगले ढाई वर्ष के लिए यह जिम्मेदारी कांग्रेस को सौंपी जानी थी। तत्कालीन वरिष्ठ नेता और वर्तमान मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने स्वयं इस सत्ता-साझेदारी फार्मूले की सार्वजनिक घोषणा की थी।

अप्रत्याशित समीकरण उभरकर सामने आए

18 अक्टूबर 2023 को सीईसी बने डा अखून का कार्यकाल 18 अप्रैल 2026 को पूरा हो गया, लेकिन उन्होंने समझौते के अनुरूप पद छोड़ने से इनकार कर दिया। उन्होंने नए जिलों के गठन और प्रशासनिक परिस्थितियों का हवाला देते हुए सत्ता हस्तांतरण टाल दिया। इसी फैसले ने गठबंधन में दरार को खुली राजनीतिक जंग में बदल दिया।

स्थिति तब और विस्फोटक हो गई जब कांग्रेस के नौ, नेशनल कॉन्फ्रेंस के पांच और दो निर्दलीय सहित 16 पार्षदों ने उनके खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पेश कर दिया। इसके बावजूद अखून पीछे हटने के बजाय राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन में जुट गए। उन्होंने भाजपा का समर्थन हासिल कर परिषद का बजट पारित करा लिया, जिससे कारगिल की राजनीति में अप्रत्याशित समीकरण उभरकर सामने आए।

30 सदस्यीय परिषद में बजट के पक्ष में 20 मत पड़े, जिनमें नेशनल कॉन्फ्रेंस के सभी 12, भाजपा के छह, कांग्रेस का एक और एक निर्दलीय सदस्य शामिल था। कांग्रेस के नौ पार्षदों ने बैठक का बहिष्कार किया। इसके बाद डा अखून ने दावा किया कि उन्हें स्पष्ट बहुमत प्राप्त है और अब अविश्वास प्रस्ताव का कोई औचित्य नहीं रह गया है। उन्होंने यहां तक कहा कि वे अपना पांच वर्षीय कार्यकाल पूरा करेंगे।

दो नए कार्यकारी पार्षदों की नियुक्ति

विवाद यहीं नहीं थमा। अविश्वास प्रस्ताव लंबित रहने के बावजूद डा अखून ने कार्यपालिका का विस्तार करते हुए दो नए कार्यकारी पार्षदों की नियुक्ति कर दी, जिसे राजनीतिक पर्यवेक्षकों ने सत्ता पर पकड़ मजबूत करने की कोशिश बताया।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नेशनल कॉन्फ्रेंस का यह कदम केवल अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं, बल्कि पार्टी नेतृत्व की साख बचाने और गठबंधन राजनीति में स्पष्ट संदेश देने का प्रयास है कि संगठनात्मक निर्णयों की अवहेलना किसी भी स्तर पर स्वीकार नहीं की जाएगी। दूसरी ओर, भाजपा के समर्थन से सत्ता बचाने की रणनीति ने कारगिल में राजनीतिक ध्रुवीकरण को और तेज कर दिया है।

ऐसे में डॉ. जाफर अखून का निष्कासन लद्दाख की राजनीति में नए समीकरणों की शुरुआत माना जा रहा है, जिसका असर न केवल कारगिल हिल काउंसिल बल्कि पूरे केंद्र शासित प्रदेश की राजनीति पर पड़ना तय है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *