
जम्मू। जम्मू-कश्मीर में उमर सरकार के खिलाफ उन्हीं के पार्टी के कई नेताओं ने मोर्चा खोल दिया है। दरअसल, हाल ही में सत्तारूढ़ नेशनल कॉन्फ्रेंस ने कैबिनेट विस्तार किया था। हालांकि, पार्टी के कई सारे विधायक सरकार के इस फैसले से खुश नहीं हैं और पार्टी में लगातार असंतोष की भावना बढ़ती जा रही है।
नेकां में असंतुष्ट गुट में कम से कम 18 विधायक हैं, लेकिन गुट का दावा है कि वह 18 नहीं हैं उनकी कुल संख्या 25 हैं। 90 सदस्यीय विधानसभा में 25 विधायकों के नाराज होने से जम्मू-कश्मीर की राजनीति में हलचल सी महसूस होने लगी है। वहीं, दूसरी तरफ प्रदेश में विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी बीजेपी इस पूरे मामले पर अपनी नजरें टिकाई हुई है। ऐसे में मौजूदा सिनेरियो को देखते हुए आइए समझते हैं जम्मू-कश्मीर के नए पावर गेम को…
किसके पास कितनी सीटें?
अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद जम्मू-कश्मीर में 2024 में विधानसभा के चुनाव हुए थे। 90 सदस्यों वाली इस विधानसभा में सबसे अधिक सीटें नेशनल कॉन्फ्रेंस ने जीतीं थी। एनसी ने 42, बीजेपी ने 29 और कांग्रेस ने 6 और पीडीपी ने 3 सीटों पर जीत हासिल की थी।
जम्मू-कश्मीर में बहुमत के लिए 48 सीटों की जरूरत होती है, जिसके बाद एनसी ने कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार बनाई और उमर अब्दुल्ला राज्य के मुख्यमंत्री बने। हालांकि, उमर अब्दुल्ला ने 2024 के विधानसभा चुनाव में गांदरबल और बडगाम दो सीटों से जीत हासिल की थी। बाद में उन्होंने बडगाम विधानसभा सीट छोड़ दी थी। नवंबर 2025 में इस सीट पर उपचुनाव हुआ और PDP के उम्मीदवार आगा सैयद मुंतजिर मेहदी ने जीत हासिल किया।
खतरा पार्टी और सरकार दोनों पर?
हालांकि, चुनाव के दो साल बाद ही उमर सरकार से उनके विधायक नाराज नजर आ रहे हैं। मौजूदा परिस्थितियों को देखें तो अगर उमर अब्दुल्ला अपने विधायकों को समझाने में कामयाब साबित नहीं होते हैं तो आगे का समय उनके लिए मुश्किलों से भरा हो सकता है क्योंकि 41 विधायकों में से 25 विधायकों के नाराज होने का दावा किया जा रहा है।
यानी नाराज विधायकों की संख्या सीएम उमर के समर्थन में खड़े विधायकों से अधिक है। अगर उमर अब्दुल्ला के विधायकों की नराजगी बढ़ती है और पूरी तरीके से बागी हो जाते हैं तो ना सिर्फ सरकार गिरने का खतरा है बल्कि पार्टी भी हाथ से निकल सकती है। क्योंकि ऐसी परिस्थितियों में इलेक्शन कमीशन बहुमत का परीक्षण करता है और बहुमत वाले गुट को पार्टी का नाम और सिंबल मिलता है और जम्मू-कश्मीर में नाराज विधायकों का गुट फिलहाल बहुमत का पूरा-पूरा दावा कर रहा है।
शिवसेना-NCP और TMC की तरह अब NC के टूटने का डर?
दूसरी तरफ बीजेपी के पास 29 विधायक हैं और ऐसे मौके पर वह इसका पूरा फायदा उठाना चाहेगी। बता दें कि महाराष्ट्र में जून 2022 में शिवसेना के कद्दावर नेता एकनाथ शिंदे ने पार्टी के कुल 55 में से 39 विधायकों के साथ तत्कालीन मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के खिलाफ बगावत कर दी थी।
जिसके बाद महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के हाथ से न सिर्फ सत्ता बल्कि पार्टी भी चली गई थी। इसी तरह जुलाई 2023 में अजीत पवार ने अपने चाचा और पार्टी के संस्थापक शरद पवार के खिलाफ साथ बगावत की थी और बाद में चुनाव आयोग ने बहुमत को देखते हुए अजीत पवार गुट को असली NCP घोषित कर दिया था।
वहीं, पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव 2026 के बाद बीजेपी की सरकार बनी। इसके बाद टीएमसी में आंतरिक कलह मच गई और पार्टी के दो-तिहाई से अधिक विधायकों ने बगावत कर दी और पार्टी टूट गई। बहुमत के आधार पर चुनाव आयोग ने बागी गुट को पार्टी का नाम और चुनाव चिन्ह दे दिया और ममता बनर्जी के हाथ से उनकी ही पार्टी निकल गई।
